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Firoz Sayyad 4th July 2019 07:50 PM

जीना इसी का नाम हैं
 
ज़िन्दगी का सफर भी क्या यह सफर हैं, इसे जीते जीते कहा आ गए
आजकल तो ज़िन्दगी अधूरी सी लगने लगी हैं, इसे जीने के लिए वक़्त की कमिसि लगने लगी हैं
इस मक़ाम पे पहुँच गए, उम्र बा उम्र बढ़ती गयी
क्या हमने पाया, क्या हमने खोया, इसके फासले भी कभी नाप लिए
कामयाब हूँ, अपने हुनर का नशा हैं, आदमी तेरी भी क्या पहचान हैं
कभी कभी यूँही महसूस सा होने लगे, मेरे हर फ़साने में कहनिसि छुपी हैं
हर कहानी में, कोई फ़साना भी दिखने लगे, सच और झूट के मायने कोई क्यों समज़हे यहाँ
पीछे मुड़कर कौन देखे, इस दौड़ धुप में कौन यहाँ कौन वहा

हर रोज सूरज निकलता हैं यहाँ, फिर डूब भी जाता हैं, यही उसकी फितरत हैं
क्योंकि उसे फिर कल निकलना हैं, रोशन जहाँ कैसे हो फिर उसके बिना
यह सिलसिले चलते रहे, इक सिफर की तरह इसे पूरा होनाभी हैं
यौमे पैदाइश से लेकर, जवानी से होते हुए, बुढ़ापा आ पहुंचे
बचपनका लड़खपन, फिर बुढ़ापे में लाठी के सहारे गुनगुनाने लगे
ज़िन्दगी का यही सफर, सादिया बीत गए, ज़माने गुजर गए
वक़्त के लम्हों ने क्या नहीं देखा, सब कुछ, आबादी और बर्बादिभि

धुप की तक़लीफ़े, समझे जो इसे, इसके सिवा कायनात अधूरी सी हैं
सुबह मासूम, तो दोपहर एक बेरुखी सी, शाम होते होते शीतलसी
शामकी ठंडी हवाएं, रात के अंधेरेमें नींदको समेटे हुए, एक आराम का सफर
ज़िन्दगी इसके सिवा कुछ भी नहीं, रात में भी कही सन्नाटे
जीना इसी का नाम हैं, जीते चलो, जीते चलो, पता नहीं कब कहा यह थम जाये
इसके पहिये कही रेत में फसे, कही जमींपर दौड़ते रहे, इसकी रफ़्तार भी कौन समझे
क्यों इसे फिर बोझ समझता हैं कोई, ज़िन्दगी मिलेगी न दोबारा सबकुछ जानते हुए

खुदानेतो हर एक के तक़दीरमें, कुछ न कुछ लिखा हैं, कौन इसे जाने हैं भला
सितारा चमकता हैं, सभी तो देखो एक जैसे पत्थरसे हैं, चमकनेवाला सीताराभी
हौसले बुलंद हो, पथरीले रस्ते भी नरमी से भरे नजर आने लगे
जमाना बदल चूका हैं, इसे जीनेके अंदाज़ भी अब नए नए हैं, अब जमीसे उंचाईतक
आजकल तो ऐसा लगे, जिंदगी क्यों अधूरी सी लगने लगे

--- फ़िरोज़ सय्यद


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