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sunita thakur
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2nd February 2016, 02:39 PM

३ जून १९६३ के अमृता प्रीतम जी से मेरे प्रथम मिलन के संस्मरण से कुछ भाग प्रस्तुत है.....

विजय० ... "धर्मयुग में आपकी कविता अभी हाल में ही पढ़ी थी, जिसमें आपने लिखा है,
.... विरह के नीले खरल में हमने ज़िन्दगी का काजल पीसा
रोज़ रात को आसमान आता है और एक सलाई माँगता है


अमृता जी० ... " अच्छा वह!"

विजय० ... " उसमें एक चीज़ मेरे लिए clear नहीं हुई। वहाँ पर आपने नीला खरल कैसे कहा है?"

अमृता जी० ... " वह पंजाबी में इस तरह है जी कि ... आप पंजाबी जानते हैं क्या, तो मैं आपको पंजाबी में ही बताती हूँ।

विजय० ... " जी, मैं भी पंजाबी हूँ... बोलता हूँ, समझता हूँ। आप गुजरांवाला से हैं, मेरा परिवार मुलतान से है ... मैं लाहोर में पैदा हुआ था।"

अमृता जी० ... " अच्छा, फिर तो पंजाबी में ही अच्छी तरह बात कर लेंगे।"


अब वह "नीले खरल" पर प्रश्न का उत्तर पंजाबी में देने लगीं। उनके मुँह से पंजाबी सुन कर मुझको बहुत अच्छा लगा, कि जैसे वह मुझको अब कुछ ही देर में "अपना" मान रही हैं। उनके चेहरे पर भी मुझको कुछ और सरलता का आभास हुआ ... बहुत सादगी दिख रही थी उनमें। इतने ऊँचे स्तर पर.. इतनी सादगी! उनमें अहम नहीं दिख रहा था।


अमृता जी० ...(पंजाबी में) अनुवाद नीचे दिया है.." ए खरल होंदा ए न, जिदे विच ए कुटदे ने, ओ नीले पत्थर दा बंढ़या होंदा ए। ऐ इक बड़ा ई खूबसूरत पत्थर होंदा वे, ते ओदे अंदर जिवें ज़िन्दगी दा सुर्मा पीसढ़ाँ होवे ... ऐथे ओदी गल कीती ए।

अनुवाद: यह ओखली होती है न जिसमें किसी चीज़ को कूटते हैं, वह नीले पत्थर की बनी होती है। यह एक बहुत ही खूबसूरत पत्थर होता है, तो उसमें जैसे ज़िन्दगी का सुर्मा पीसना हो ... यहाँ उसकी बात करी है।


विजय०... "और आगे आपने कहा, रोज़ रात को आसमान आता है और एक सलाई माँगता है.. this gives a beautiful analogy to life!

अमृता जी०... "पंजाबी में सुनाऊँ? ... रोज़ रातीं अम्बर आंदा ए, ते इक सलाई मंगदा ए।"

विजय०... "इतने थोड़े-से शब्दों में आपने ज़िन्दगी की कि-त-नी गहराई दे दी है!

सच, हम विरह को रात को ही ज़्यादा अनुभव करते हैं .. नींद के समय।


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.....Sunita Thakur.....

यह कह कर मेरा दुश्मन मुझे हँसते हुए छोड़ गया
....के तेरे अपने ही बहुत हैं तुझे रुलाने के लिए...


   
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