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गुलों मे रंग भरे, बाद-ए-नौबहार चले
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Qasid
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गुलों मे रंग भरे, बाद-ए-नौबहार चले - 30th September 2016, 01:29 AM

गुलों मे रंग भरे, बाद-ए-नौबहार चले
चले भी आओ कि गुलशन का कारोबार चले

कफ़स उदास है यारों सबा से कुछ तो कहो
कहीं तो बह्र-ए-खुदा आज ज़िक्र-ए-यार चले

कभी तो सुब्ह तेरे कुन्ज-ए-लब से हो आगाज़
कभी तो शब् सर-ए-काकुल से मुश्कबार चले

बड़ा है दर्द का रिश्ता, ये दिल गरीब सही
तुम्हारे नाम पे आएंगे गमगुसार चले

जो हम पे गुजरी सो गुजरी मगर शब्-ए-हिजरां
हमारे अश्क तेरी आकबत संवार चले

हुज़ूर-ए-यार हुई दफ्तर-ए-जूनून की तलब
गिरह मे लेके गरेबां के तार-तार चले

मकाम कोई फैज़ राह मे जचा ही नही
जो कू-ए-यार से निकले तो सू-ए-दार चले


Nayaab ghazal ko ab in alag alag awaazon mein bhi suniye








Qasid


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नाम-ए-वफ़ा की जफ़ा बताएं
क्या है ज़हन में क्या बोल जाएँ

रफ़्तार-ए-दिल अब थम सी गयी है
'क़ासिद' पर अब है टिकी निगाहें

Last edited by Qasid; 30th September 2016 at 01:36 AM..
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