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पुराने जाम पर_ वफा
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wafa ali
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पुराने जाम पर_ वफा - 4th November 2007, 11:31 AM

पुराने जाम पर_ वफा

किस्मतें कीस्की तराशी थी पुराने जाम पर
पीगये सब मयकदेमें बस तेरे नाम पर.

ये शरारत आपकी,बादलमें वाबस्ता रही,
गीर रही है बिजलियां देखो हमारे बाम पर.


(4नवे.2007)
   
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बद दुआ क्यों दुं _वफा
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wafa ali
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बद दुआ क्यों दुं _वफा - 9th November 2007, 11:26 AM

बद दुआ क्यों दुं _वफा



आनसे जीयो और चमकते बानसे जीयो.
जो जीयो तो अपनीही उडान से जीयो.

हजार साल जीनेकी में बद दुआ क्यों दुं,
जीतना भी जीयो शौकतो शानसे जीयो.

(9नवे.2007)

Last edited by wafa ali; 9th November 2007 at 11:28 AM.. Reason: spell error
   
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raj...
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11th November 2007, 08:05 PM

wafa ali ji '' main raj sharma mujhe aapka kalam bahut hi pasand aaya. ali ji aap hamesha hi isi pikaar likhte raho........


Love is life
raj...
   
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किस्मतें लूट गई _वफा
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किस्मतें लूट गई _वफा - 12th November 2007, 09:53 AM

किस्मतें लूट गई _वफा

ढस गई दिवार भी ये रात की.
किस्मतें लूट गई सब ख्वाबकी.

आंख मी रूठी रही कुछ नींदसे
उलट गई सब करवटें बेताब की.

ये दिये की लौ क्यों जल्ती नहीं,
उठ रही है चिलमन क्या आपकी?

जिंदगी भी रुक गई एक मोड पर
शर्मा रही है सब दुलहने शामकी.

लग रहें है फ्ल मुकद्दरके ’वफा’
झुक रही है डालियां नाशाद्की


9नवे.2007
   
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तस्वीर देख लो_वफा
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तस्वीर देख लो_वफा - 22nd November 2007, 10:19 AM

[[I]तस्वीर देख लो[/I]

तस्वीर देख लो , जरा परछाई देख लो.
जिंदगी के साझकी हरजाई देख लो.

करतें है कारोबार सब अपने ही ढंगसे,
शक्लें अलग अलग है अपनाई देख लो.

हर रागमें अलापी है बस अपनी कहानियां,
हर ढोलतासे बीन और शहनाई देख लो.

सुरज से टपकी हो या लबे चांदनीसे हो,
उन्हींके रंगोकी है सब रअनाई देख लो.

अब क्या बघारे हम गमे आशिकी यहां,.
किर्तास कलमकी जरा महगाई देख लो.

(22नवे.2007)

Last edited by wafa ali; 22nd November 2007 at 10:20 AM.. Reason: error
   
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6th January 2008, 09:49 AM

रुक गया._वफा

मुफ्लीसकी तक़दीरका मयखाना रुक गया.
आते आते हाथ तक पयमाना रुक गया.

मंझील बहुत करीब थी, राहबर बना रकीब
आया कोइ एक मोड तो बैगाना रुक गया.

आकिल निकल गया हदे उश्शाक से आगे,
सहराकी छलनीओपे दीवाना रुक गया.

दर्द का अजीब एक सूरज भी जल उठा
चांदनीके गांवमे अनजाना रुक गया..

जंगल उगल गइ बुलबुलोंकी कुछ चहक,
बहते हुए दरियाका एक धाना रुक गया.

उडते रहे हवाओंमें कुछ उम्मीद के शरारे
हम जो चले आगे ‘वफा, जमाना रुक गया.

(5 डीसे.2008)
   
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मायुस कर दिया_वफा
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मायुस कर दिया_वफा - 8th January 2008, 01:35 AM

मायुस कर दिया_वफा

तारीकयोंको ढुंढने हम शाम तक चले,
चांद तारोंने हमे मायुस कर दिया.

7 जान.2008
   
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8th January 2008, 06:34 AM

कोहराम से_ वफा

कट गई कुछ तेरे बगैर आराम से.
बस पी रहा हुं अब खयाली जाम से.

अजनबीयोंके शहरमें में खो गया
कीसने पुकारा आज मुजको नाम से.

हम तो चले थे बेनियाजी चालसे,
ख्वाबकी चिडिय़ां उडी एक बाम से .

लावा बन कर चला अलल सुबह
थक कर सूरज थम गया शाम से.

भीडके सहरामें तडपाहै शहर,
शोर सडकों पर उगा कोहराम से.

(7जान्यु.2008)
   
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Yaad
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Wink Yaad - 8th January 2008, 10:51 AM

Har Subha Teri Muskurati Rahe,
Har Shaam Teri Gungunati Rahe,
Tu Jisse Bhi Mile Is Kadar Mile Ki,
Us Shaks Ko Teri Yaad Aati Rahe.
   
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कया बने?_वफा
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कया बने?_वफा - 10th January 2008, 08:13 PM

कया बने?_वफा

ख्वाबोंके सद्फ से तो हार क्या बने?
बिखरे हुए तबस्सुमसे प्यार कया बने?

घेराव चाहिये आहनी दस्तोंका वहां
ज़ूल्फोंकी असीरीसे तो दार कया बने?

नमरूद का आतिशकदा जिंदातु कर ए दोस्त,
ये ईश्ककी सोजिशसे तो नार कया बने?

चाहतें है हम तो देखे तुझे के जैसा तु,
ये अक्स के साये से तो दीदार क्या बने?

खो जाऎं तेरे ईश्क्की वादीमें हम ‘वफा.
ये मोका परस्त यादसे बीमार कया बने?

(10जान.2008)
   
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कया बने?_वफा[
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कया बने?_वफा[ - 11th January 2008, 09:32 AM

कया बने?_वफा

एक आढसी अदरक से बाजार कया बने?
ये दरख्तकी शाख से तलवार क्या बने?

संग चाहिये मजबुत या पकी हुई ईंटे
भला कागजोंकी ईंटसे दीवार कया बने?
   
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रंजिश चाहिये_वफा
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रंजिश चाहिये_वफा - 16th January 2008, 06:13 AM

रंजिश चाहिये_वफा


बस अकेले तिनकोसे क्या आशियं बने,
कूछ खूने जिगरकी भी आमेजिश चाहिये.

कोइ चमन भी फूल से बन नहीं सकता,
कुछ खिझां और खारकी रंजिश चाहिये.

(15जान.2008)
   
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सौदा नहीं करता_ मोहम्मदअली वफा.
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सौदा नहीं करता_ मोहम्मदअली वफा. - 26th January 2008, 06:56 AM

सौदा नहीं करता_ मोहम्मदअली वफा.

में दर्द को बाजारमें बेचा नहीं करता.
उम्र की जागीर है सौदा नहीं करता.

जिंदगीके मोड पर फिसला नहीं कभी
उम्मीद के खारों पर रोया नहीं करता.

ए तो बहाव उम्रका पानीकी तरह है
तूटी हुइ मीनाको जोडा नहीं करता.

आझाद हुं अझादीका फंदा है गलेमे
में हर गलीमें आपको ढुंढा नहीं करता.

बादलोमें कीस तरह घरोंदे’वफा’ बने,
में रेत पर किस्सा लिख्खा नहीं करता.
(26thJan.2008)
   
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26th January 2008, 12:59 PM

Quote:
Originally Posted by wafa ali View Post
Daste dua ho jayega

beemar tera dekhke daste dua ho jayega .
Tera yahan aekbar ka ana dava ho jayega .

Dilki ye kishkol to hamne kabhi kholi nahin
Koi de ya na de hamein sabka bhala ho jayega .

Phool ,patthar,kante ho ya ho bijliyonka khiraj
Jo bhi girega ish nasheman per hava ho jayega .

Yoon isharo aur kinayo mein kahoge kabtak
Jo jaban se apni keh do ge to kya ho jayega .

Loot le jao yahanse phool,patti.shakho,phal
Ye chaman ab kuch dinomein viran ho jayega .

Bana phirta he ye phiron aur shaddad ka beta
Khuda wahid ko chhor kar kya khuda ho jayega .?

Sham ke kandho pe roya khoon ke ansu suraj
Barbadyon ki rat ayegi tabah ho jayega .

Hamne “Wafa” waqt ki rassi kabhi thami nahin
Kuch bhi kahenge jamanese gilaa ho jayega .
very nice keep it up ali ji
   
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yash chawla
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26th January 2008, 01:00 PM

WOW VERY NICE ,,,,,,,,,,,,
Quote:
Originally Posted by wafa ali View Post
सौदा नहीं करता_ मोहम्मदअली वफा.

में दर्द को बाजारमें बेचा नहीं करता.
उम्र की जागीर है सौदा नहीं करता.

जिंदगीके मोड पर फिसला नहीं कभी
उम्मीद के खारों पर रोया नहीं करता.

ए तो बहाव उम्रका पानीकी तरह है
तूटी हुइ मीनाको जोडा नहीं करता.

आझाद हुं अझादीका फंदा है गलेमे
में हर गलीमें आपको ढुंढा नहीं करता.

बादलोमें कीस तरह घरोंदे’वफा’ बने,
में रेत पर किस्सा लिख्खा नहीं करता.
(26thJan.2008)
   
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बेताब ही निकले._मोहमदाअली’वफा’
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बेताब ही निकले._मोहमदाअली’वफा’ - 29th January 2008, 11:15 AM

बेताब ही निकले._मोहमदाअली’वफा’
*

मुफलीसके मुकादरमें नायाब ही निकले.
सब सितारे रातको बेताब ही निकले.

जाके सूरजकी आंखमें कोइ झहर घोले,
ईस शहर के बाम से नासाझ ही निकले.

तुने रचाई अब कतलकी खूब ये साझिश,
मर जाये मझलुम न कोइ बात ही निकले.

अपने समझके जिनको अपनाये थे ‘वफा’
सब के सब आस्तीनके सांप ही नीकले.

हमने रचाइ जिस्के पर उम्मीदकी मंझिल
वो तो ‘वफा’ बेदारीके खवाब ही निकले.
** * ** * **
होता नही रफीक भी खुश देख कर हमें,
फीर रकीब से कोइ उम्मीद क्या रखें



29जनवरी2008
   
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बरसोके बाद भी- ‘क़ालु’ कव्वाल
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बरसोके बाद भी- ‘क़ालु’ कव्वाल - 2nd February 2008, 04:54 AM

[
बरसोके बाद भी- ‘क़ालु’ कव्वाल


जालिम रहा है आसमां बरसोके बाद भी.
अदावत भरा है ये झमां बरसोके बाद भी.

मोहिद बने रहना यहां होता गूनाह कया?
जारी अभी तक ईमतेहां बरसोके बाद भी.

हमतो बने बारिश कदे जंगल जरा देखो,
कटते रहे हमतो यहां बरसोके बाद भी.

मांगा पसीना तो हमारा खूने जिगर दिया,
फिरभी बने हम ही निशां बरसोके बाद भी.

घर भी गये लूटे यहां असमत भी लूट गइ,
मिलता नहीं कोइ पासबां बरसोके बाद भी.

आई कभी खद्दर कभी तो रंगे जाफरां ,
दुश्मन रहे बूढे जवां बरसोके बाद भी.

खंजर रहे कातिल दरिंदो के हम पर घूमते
बन कर रहे मझलुम यहां , बरसोके बाद भी.

ये चमन महरुम था बहारों की वो फसल से
छाई रही हमपर खिझां बरसोके बाद भी.

दिलके फफोले ‘कालु’ खोलुं अब जा कर कहां,
हसते रहे सब सुन बयां बरसोके बाद भी.
[/I
   
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शीकवए कालु_कालु कव्वाल
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शीकवए कालु_कालु कव्वाल - 4th February 2008, 09:04 AM

शीकवए कालु_कालु कव्वालशीकवए कालु_कालु कव्वाल


शहीदे हिंद महात्मां गांधी के नाम!


कातिल रहे जो आपके दर्दे निहां, बन गये.
राहझन बदल कर बेश खुद राहेनुमां बन गये.

खूनो खराबाकी रही आदत यहां,जीनकी
वो कौमके देखो जरा अब महेरबां बन गये.

रंगीन है जो आपके वो खूनसे हाथ तक
वो बापु हिंदमें हमारे पासबां बन गये.

हां मुल्क के ये सब कमीने गीध के बच्चे
हरदम रहे दर्दे जिनां रश्के जिनां बन गये.

समजा गया हुकमे खुदा हैवान का ये पुजना
अफ्जलुल हेवां के सभी कातिल झमां बन गये.

ईनसानियत के जो बने दागे बदनुमा यहां
वो आज देखो अजमतों के भी निशां बन गये.

हेसियत थी ना कोइ के दाना बने राइका
गर्दिश चली जो वकतकी तो आसमां बन गये.

‘कालु’ कभी तो जाग ऊठेगा मुकद्दर हिन्दका
कातिल सभी मिट जायेंगे जो कारवां बन गये.
   
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5th February 2008, 08:36 AM

Mere Liye Appki Poetry Kyun Nahin Show Ho Rahi
Yahan Sirf Questions Mark A Rahe Hein..?



Jub Hua Zikar Zamane Mein Muhabbat Ka
Mujhko Appne Dil Ki Nakami Peh Rona Aya

   
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ऐसी निशानियां_मोहम्मदअली’वफा’
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ऐसी निशानियां_मोहम्मदअली’वफा’ - 9th February 2008, 10:35 AM

ऐसी निशानियां_मोहम्मदअली’वफा’


ला कर मुझे देदो कोइ ऐसी निशानियां
मीली नहो जीस्में कोइ उनकी कहानियां.

आंखोमें छीप सकती नहीं दास्ताने गम,
पलको से बह जाएगी अश्की रवानियां.

(9फरवरी2008)
   
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देख ले_मोहम्मदअली’वफा’
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देख ले_मोहम्मदअली’वफा’ - 12th February 2008, 04:38 AM

देख ले_मोहम्मदअली’वफा’


मयखानेमें पीने का अंदाझ देख ले.
साकीया तु घर मेरा बरबाद देख ले.

अल्फाज खो गये माअनीकी भीड में,
तन्हाईओंसे ये कलम आबाद देखले.

किचड भरे आलुदह तालाबका पानी,
खिलते कमलको वहीं शादाब देखले.

सर बांधे कफन आ गये फाके भरे साये,
वो भूख के दरियाओंको बेताब देख ले.

हश्र से पहेले हुई है एक हश्र है पैदा,
मजबुरियों की आंखका तालाब देखले.

(10फेब्रु.2008)
   
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एक दिनकी महोब्बत__मोहमदअली,वफा,
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एक दिनकी महोब्बत__मोहमदअली,वफा, - 14th February 2008, 09:36 AM

एक दिनकी महोब्बत__मोहमदअली,वफा, [/B]

प्यार भी कोइ एक दिन का हुआ करता है.
जीस्म में एक दिन ही खून क्या बहता है,

ईश्कतो सौदा है हर सांसे, जिंदगानीका,
प्यार वेलेंटाईन मेंही जाके कहीं रुकता है?


एक दिनकी सखावत मेरे महेबुब न मांग.
एक दिनकी महोब्बत मेरे महेबुब न मांग.


ये फूलके गजरे ,दिलों मे तीर के कागज
रोशनी गलियोंमे, ये होटलमे शोरकी आहट,

सौदा है दिलका वो भी महज एक दिन के लिये,
मीलेगी किस तरह फिर सौचो जिंदगी में राहत.


ये धोके की मुसीबत मेरे महेबुब न मांग.
एक दिनकी महोब्बत मेरे महेबुब न मांग.


एक दिन की खुशी भी खुशी होती है कभी,
एक दिन की हंसी भी हंसी होती है कभी,

एक दिन के उजालेसे तो रात टलती नहीं,
एक दिन के पीलाने से गशी होती है कभी..


युं बरसों की अदावत मेरे महेबुब न मांग.
एक दिनकी महोब्बत मेरे महेबुब न मांग
   
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14th February 2008, 10:33 AM

Aslam u alaikum ,


janab maan laity hain k app ki poetry bahut achi hoo gee but sahi to yeh hai k mujhy Hindi perhna nhi ati mai Urdu per sakta hoon ya ager apny kalam ko translate ker dain english hindi mai i mean jaisy mai likh rha hoon enlish word use ker k

shuker guzara rahoon ga ap ka

Mujeeb
   
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झुग्गी है कीसी कैस की_मोहम्मदअली वफा
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झुग्गी है कीसी कैस की_मोहम्मदअली वफा - 24th February 2008, 11:45 PM

झुग्गी है कीसी कैस की_मोहम्मदअली वफा



हलका सा गला पायाहै उस्को भी मोड दो.
ईंसानियतका जीस्म है हलकेसे तोड दो.

मील जायेंगे सब रास्ते जंगल बयांबां के,
वहशी नगरमें जाकर ताअल्लुक को जोड दो.

अशक तुमहारी आंखसे बहने लगे कभी,
अपनेही कलेजेकी कोइ आंख फोड दो.

मस्जिद को जो तोड कर पहोंचे थे तख्त पर,
वापस वहां जाना है तो मंदिर भी तोड दो.

ये हाथमें पथ्थर लिये फिरते हो क्यों वफा
झुग्गी है कीसी कैस की उसको तो छोड दो.

24 फेब्रु.2008
   
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मयकदाका रास्ता_मोहम्मदअली वफा
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मयकदाका रास्ता_मोहम्मदअली वफा - 29th February 2008, 11:10 AM

मयकदाका रास्ता_मोहम्मदअली वफा

हर रोज मुझसे तूटता है ये अहद,
पीता नही हुं में पीला देता है कोइ.

मेरे कदम तोहोते हैं मेरे घर तरफ,
मयकदाका रास्ता दीखा देता है कोइ
******

Har roz mujhase tootta hai ye ahad,
Peeta NaheeN huN me peela deta hai koi.


Mere kadamto hote haiN mere ghar taraf,
Mayqadeka raasta deekha deta hai koi.

Last edited by wafa ali; 29th February 2008 at 11:11 AM.. Reason: spell error
   
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3rd March 2008, 12:44 PM

Teer aur talvar ko rok kar dekho.
Ishq ke beemar ko rok kar dekho.

Jal jayega aehsas ka ful ye tera
Jajbat ke koi tar ko rokkar dekho.

Ja kar milegi khwab ke saye tale
Koi kisike yar ko rok kar dekho.

Jalti rahegi abke chashmo tale sada
Ishq ke angar ko rok kar dekho.

Khamoshiye lab ko majboori na samajna
Khoon ki pookar ko rok kar dekho.
   
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4th March 2008, 01:54 PM

wah
kia baat hai wafa ali sahab very nice poetry janab aap kahana say likhty hain itni achi poetry sir i LIKE IT
   
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4th March 2008, 01:57 PM

bahot achha likhte hain aap
waise itne achhe khayal aate kaha se aapko
waise all d best
   
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alone anum
DANIYAL ANUM
alone anum is on a distinguished road
 
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4th March 2008, 03:42 PM

ASSALAM O ALIKUM kia haal hai janab
nice wafa ali sahab
Shaam Hote Hi Chiragon Ko Bujha Deta Hoon
Yeh Dil Hi Kaafi Hai Teri Yaad Main Jalne Ke Liye
Yeh Teri Bhi Aankhon Ka Qusur Hai
Main Tanha Gunahgar To Nahi
Tu Is Tarah Se Mere Dil Main Shamil Hai
Jahan Bhi Jaoon Lagta Hai Teri Mahfil Hai
Duniya bhar ki khushiyan hamare saath chali
Qadam mila ke jo hamare saath aap chali
Haath deewane ke de allah kuch aisi qalam,
Aasman par likh ke jaoon hai unhi se pyaar hai
   
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ब खैरियतसे है_आतिश मलहारी.
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ब खैरियतसे है_आतिश मलहारी. - 16th March 2008, 11:33 AM

सब खैरियतसे है_आतिश मलहारी.


है खूश्क अब आंसुकी धार, सब खैरियतसे है.
मकतुल हुए दो तीन हजार सब खैरियतसे है.

खूश हैं कि अब रह गया एक छोटास कुंबा,
घरसें मरे हैं दो, या चार सब खैरियतसे है.

बच्चे बचे मां बाप मनाते स्वर्गमें खुशियां ,
मौका मिला कैसा ए यार सब खैरियतसे है.

कहतें है जो घाव थे वो भर गयें है सब,
जहीरा बनी हमरी थी यार सब खैरियतसे है.

बिलकीस का केस तो ह्युमन राईटने बिगाडा ,
हमरे यहां था कोइन बार सब खैरियतसे है.

एक चुनाव जीत लिया खूनो खराबा से,
अब है तरक्की की पुकार सब खैरियतसे है.

हालत उनकी बहुत बहेतर अब हो गइ
उनको दीया एसा है मार सब खैरियतसे है.

जख्मोंको कुरेद कर क्या तुमने बिगाडा ,
जीत गयें हम दुसरी बार सब खैरियतसे है.

_ आतिश मलहारी.
[/CENTER
]

Last edited by wafa ali; 16th March 2008 at 11:38 AM.. Reason: spell error
   
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तसलीबका अनसर__मोहम्मदअली वफा
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तसलीबका अनसर__मोहम्मदअली वफा - 20th March 2008, 11:21 AM

तसलीबका अनसर__मोहम्मदअली वफा


दामनमें हो फूल या अंगार ठीक है.
तुम्ही जो करते नहीं जब प्यार ठीक है.

खतरेमे हो जान का सौदा जहां हरदम.
आझादी से झंझिरका बार ठीक है.

वादे हो सब झूठ तो वादा नहीं होता,
रंजिश हो ठोडी मगर ईनकार ठीक है.

देदे मेरी रूहको तसलीबका अनसर
तौबा ये कलीसेसे , बाजार ठीक है

ये तेरे मतबमें एक ही दवा का चलन,
ईससे से तो ये ईश्कका बिमार ठीक है.
   
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फरेबका बाज़ार देखिये _ मोहम्मदअली वफा
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फरेबका बाज़ार देखिये _ मोहम्मदअली वफा - 30th March 2008, 11:57 AM

फरेबका बाज़ार देखिये


उठ गइ है आंख से तलवार देखिये
बनती है किसके गलेका हार देखिये.

जब भी मीले हमें, भूले उज़र कहां
उंनका ये बे मिसाली प्यार देखिये.

रातें भी रोती रही साये तले वहां,
दर्दोंके ये चांदका ईसार देखिये.

असवद मलता रहा सूरज लयल को,
उसकी मकर फरेबका बाज़ार देखिये.

किसका शिकवा’वफा’ करते रहें यहां,
सब यहां पाये गये बीमार देखिये.,

_ मोहम्मदअली वफा




   
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खूने रवां देखा_मोहम्मदअली वफा
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खूने रवां देखा_मोहम्मदअली वफा - 4th April 2008, 09:27 AM

खूने रवां देखा



शीद्द्ते प्यास बढ़ाने को ए सहरा देखा.
नीकलता पहाडसे डुबोने हमे दरिया देखा..

लज्जते मयकशी का शौक तो थाभी कहां.
जो गये मयकदेमें तो शोर एक़ बपा देखा.

मिलाया हाथ है अब रफीकों ,रकीबोने,
रंग अदुव्वतका महेरबानोमें जवां देखा.

मगसल में भी तु, मकतलमें तु ही रहा
न जाने दोस्त मेने तुझे कहां कहां देखा.

बुझ गया आग का लावा ईन आंखोंसे वफा.
फीर भी जल्ती हुई नब्ज पे खूने रवां देखा.

_मोहम्मदअली वफा


3rdApril2008
,
   
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उल्फत नरही ___मोहम्मदअली वफा
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उल्फत नरही ___मोहम्मदअली वफा - 15th April 2008, 07:20 AM

उल्फत नरही



उसे मिलने मिलानेकी उल्फत न रही.
चुभोने खार दिलमें अब हिंमत न रही

करें सौदा कहां अब उन बहारोंका,
गुलो लाला लुटानेकी आदत न रही.

करो जो वार तो अपने हाथों से करो,
बुलाने गैर से कोई अझमत न रही.

हुए बौने सभी कोइ भी उंचा न मिला
कभी नजरें उठानेकी कामत न रही.

सबा जो आइ खूश्बुके गुन्चों को लिये,
दिलोंमे सांस जमाने की रगबत न रही.


14एप्रील008
   
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http://bagewafa.wordpress.com/ - 15th April 2008, 12:08 PM

Please go to the below mentioned blog to read Urdu_Hindi poetry
http://bagewafa.wordpress.com/
   
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दर्दे दिल_ मोहम्मदअली वफा
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दर्दे दिल_ मोहम्मदअली वफा - 23rd April 2008, 10:37 AM

दर्दे दिल_ मोहम्मदअली वफा

दर्दे दिल है मगर किसको दिखायें चीर कर.
अपने गमका मामला है क्युं सुनाए चींख कर.

सब हुए मशरूर, जब कि सुना किस्सए गम.
एक छोटी सी कहानी क्युं बढ़ाये खींच कर.

जब संभलनाथा हमे संभ्ले नहीं ए दोस्तो
अब फिसलती राह पर क्यों चले हम देख कर.

चार दीवारी बनी है ,गर चुकाके किमत बड़ी,
मिल गया है घर हमें जिन्दगीको बेच कर.

आंखकी किस्मतका चमका है तारा अब वफा,
सुरमे का पत्थर है, ये उस्को लगाना पीस कर.

22एप्रील2008
   
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तकदीर का शीशा_ मोहम्मदअली वफा
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तकदीर का शीशा_ मोहम्मदअली वफा - 28th April 2008, 10:00 AM


तकदीर का शीशा_ मोहम्मदअली वफा
अजीब शय है रंग भी ये, बदलाही करता है.
दिलकाभी एक रंगहै शिकवाही करताहै.

ये लगे ताउसके परमे या गिरगीट के गले,
कौसेने_ आबमें पडा चमकाही करता है,

चहेरा बदलनेकी जरूरत है नहीं अब तुम्हें,
रंगका बादल है ये पिघलाही करता है.

अफ्सोस के साये तो घटतेहैं बढते हैं,
किस्मतका तारा भी उलझा ही करता है.

चंद आंसु के सिवा दे सकते हो क्या उसे,
चढता हे जो उपर, नीचे उतराही करता है.

तदबीरकी तस्बीहमें पिरोते रहो दाने,
तकदीर का शीशा तो तूटाही करता है.

(28एप्रील2008)

Last edited by wafa ali; 28th April 2008 at 10:01 AM.. Reason: spell error
   
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कोशिश भी करेंगे._ मोहम्मदअली’वफा’
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कोशिश भी करेंगे._ मोहम्मदअली’वफा’ - 3rd May 2008, 09:37 AM

कोशिश भी करेंगे._ मोहम्मदअली’वफा’


हंस हंस कर गिरानेकी कोशिश भी करेंगे.
जल्ते को जलाने की कोशिश भी करेंगे.

बनते फिरेंगे ये सदा हमदर्द व हमगम
हंसते को रुलानेके कोशिश भी करेंगे.

फूंका है जीस्ने, जाके मझारे ‘वली’ कभी
सजदा वहां करानेकी कोशिश भी करेंगे.

सोयें पडे हैं, अपनी कबरमें जो बद नसीब
उन्हे ये जगानेकी कोशिश भी करेंगे.

कातिल हमारे अब मकतलमें बैठ कर
जिंदा हमें बनानेकी कोशिश भी करेंगे.

मरम्मत की खोली है , नयी दुकान अब,
खंडहर को सजानेकी कोशिश भी करेंगे.

खंजर, तलवारको को अब हाथ में लिये
स्ब्जा को दिखानेकी कोशिश भी करेंगे.

जो जखम पूराने है उनको तो भूला दो
ताजा नमक लगानेकी कोशिश भी करेंगे.


2मे2008
   
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समंदर कहां गया_मुहम्मदअली वफा
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समंदर कहां गया_मुहम्मदअली वफा - 12th May 2008, 09:58 AM

समंदर कहां गया_मुहम्मदअली वफा



एक जिंदगी जीनेका तसव्वुर कहां गया
अशआर में ढलनेका तखय्युल कहां गाय.

सब सोचनेकी आदतें मफ्लूज हो गई,
हिकमतके मोतीओं का तदब्बुर कहां गया.

तूटी हुई है दिलकी सब शीशे की बस्तियां,
रुह की तस्बीहका तसलसुल कहां गया.

सन्नाटा छा गाया है टहनी पे खून की
नब्जोमें चहकताथा वो बुलबुल कहां गया.

ढूंढने न पाई उसे रोशनी की आंख
हाथों पे खेलता था मुकद्दर कहां गया.

दौर के आई है सब नदद्दीयां उम्मीदकी
बाहों में छुपा लेताथा, समंदर कहां गया.

11 मे 2008
   
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दुश्मन भी बदलदुं.__ मुहम्मदअली’वफा’
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दुश्मन भी बदलदुं.__ मुहम्मदअली’वफा’ - 9th June 2008, 07:59 AM

दुश्मन भी बदलदुं.__ मुहम्मदअली’वफा’


चेहरा भी बदलदुं और चिलमन भी बदल दुं,
क्या कह रहे हो आज तुम, दुश्मन भी बदल दुं.

हम तो खिलेंगे वहां बंझर हो या सहरा,
मुमकीन नहीं है दोस्त में उपवन भी बदल दुं.

बहता रहा में तो कभी जंगल बयांबां में,
फितरत नहीं मेरी कि पहरन भी बदलदुं.

मासुमियत के बर्ग से जीसका निखार है
मुमकिन है कैसे कि बचपन भी बदलदुं.

मेरी वफा का साथ रहे गा अदम में भी,
में वो नहीं जो डरके मसक्न भी बदल दुं

8जुन2008
   
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